रूल्याणी की पावन धरती
राजस्थान के चूरू अंचल की भक्ति-परंपरा से जुड़ा रूल्याणी ग्राम आज श्री मोहनदास जी महाराज की जन्मस्थली के रूप में श्रद्धा से स्मरण किया जाता है। यह वही भूमि है जहाँ उनके जीवन के प्रारम्भिक संस्कार पड़े और जहाँ बालक मोहन ने पहली बार भक्ति को अपने जीवन के सहज वातावरण के रूप में अनुभव किया।
उनका परिवार धार्मिक संस्कारों से सम्पन्न था। पंडित लच्छीरामजी पाटोदिया रामभक्त दाधीच ब्राह्मण परंपरा से जुड़े विद्वान व्यक्ति थे। परिवार की भक्ति परंपरा का संबंध रैवासा की अग्रपीठ और वहाँ विकसित रामभक्ति की साधना-परंपरा से भी बताया जाता है।
घर में पूजा-पाठ, रामनाम, हनुमान चालीसा और संतों की संगति जीवन का स्वाभाविक हिस्सा थे। बालक के लिए यह वातावरण कोई अलग धार्मिक शिक्षा नहीं था; वह उसके दैनिक जीवन का ही हिस्सा था।
इसी वातावरण में लच्छीरामजी और गायत्री देवी के परिवार में छह पुत्रों और एक पुत्री का परिवार बढ़ा। पुत्री थीं — कान्ही। और सबसे छोटे पुत्र थे — मोहनदास।